नहिं निर्गुन सर्गुन नहीं

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 82 of 135

राधेजू मेरौ जनम सुधारौ। अब मोंहि वृन्दावन में डारौ॥ - श्री गोविन्दशरण देवाचार्य राधेजू मेरा जन्म सुधारो। अब वृन्दावन में साधुओं को डर लगता है.. - श्री गोविंदशरण देवाचार्य
नवधा भक्ति निमित्त लै, जे सेबत अवतार।पाँयन परि बिनती करै