परिचय :

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 94 of 135

परिचय : अनन्य रसिकाचार्य श्री स्वामी हरिदास जी की परंपरा में यों तो अनेकानेक समर्पित भक्त और साधक हो चुके, उन सब में श्री भगवतरसिक जी का अपना विशिष्ट महत्व और स्थान है। उनकी वाणी का अवगाहन करने पर पता चलता है कि उनके पारदर्शी व्यक्तिव्त में सखी संप्रदाय की रसोपासना सम्पूर्ण तेजस्विता लिए मूर्तिमान हो उठी है। साधना मार्ग के अनेक सोपानों पर चढते हुए उन्होंने ऊँचाई के उन शिखरों पर पहुँचकर अपना आसन जमा लिया था जहाँ तक किसी बिरले की ही पहुंच हो पाती है। परिचय: वैसे तो अन्य रसिकाचार्य श्री स्वामी हरिदास जी के अनेक समर्पित भक्त एवं साधक हैं, परंतु उनमें श्री भगवतर्सिक जी का अपना विशेष महत्व एवं स्थान है। उनके भाषण को सुनने से यह स्पष्ट हो जाता है कि उनका पारदर्शी व्यक्तित्व सखी संप्रदाय के प्रेम और भक्ति को अपनी पूर्ण महिमा में दर्शाता है। साधना पथ की अनेक सीढ़ियाँ चढ़कर उन्होंने स्वयं को उन ऊँचे शिखरों पर स्थापित कर लिया था, जहाँ कोई विरला ही पहुँच पाता है।
भगवत रसिक उदार स्वामिनी, दैहैं सर्बसु छोरी चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि