जद्यपि हम सब भाँति ही

Bharatendu Granthavali — श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र

Verse 11 of 52

(कवित्त) गुनी जन सेवक और चाकर चतुर के हैं, कविन की मति चित्त हित गुन मानी के। [1] सीधेन सौं सीधे महाँ बाँके हम बाँकेन सौं, हरिचन्द नकद दमाद अभिमानी के॥ [2] चहबै की चाह, काहू की न परवाह, नेकी नेह के दिवाने सूरत निवानी के॥ [3] सर्वस रसिक के सुदास दास प्रेमिन के, सखा प्यारे कृष्ण के गुलाम राधारानी के॥ [4] - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली (कविता) गुणी लोक सेवक और सेवक चतुरों के होते हैं, कवि की माटी गुन मणि का हृदय और आत्मा है। [1].
जद्यपि हम सब भाँति हीजद्यपि हम सब भाँति ही