जद्यपि हम सब भाँति ही

Bharatendu Granthavali — श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र

Verse 12 of 52

हम चाकर राधा रानी के। ठाकुर श्री नंद नंदन के, वृषभानु लली ठकुरानी के॥ [1] निरभय रहत वदत नहिं काहू डर नहिं डरत भवानी के। 'हरीचंद’ नित रहत दीवाने, सूरत अजब दीवानी के॥ [2] - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, होली (11) हम राधा रानी के सेवक हैं। नंदन के ठाकुर श्री नंद, लाली ठकुरानी के वृषभानु। [1] निर्भय रहते हुए डरने की कोई आवश्यकता नहीं है, भवानी से कोई भय नहीं है। 'हरिचंदा' नीता राहत दीवाने, सूरत अजब दीवाने के.. [2] - श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, होली (11)
जद्यपि हम सब भाँति हीजद्यपि हम सब भाँति ही