जय जय जय जय जय श्री राधा
Bharatendu Granthavali — श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र
Verse 17 of 52
हमरे निर्धन की धन राधा।
साधन कोटि छोड़ी इन्हीं को चरण कमल अवराधा॥ [1]
इनके बल हम गिनत न काहु करत न जिए कोउ साधा।
‘हरीचंद' इन नख सिख मेरी हरी तिमिर भव बाधा॥ [2]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, राग संग्रह (136)
हमारे गरीबों की धन राधा। इन छोटी-छोटी बच्चियों को अद्भुत आशीर्वाद मिला है.. [1] यहां तक कि उनके बाल भी नहीं गिने जा सकते, न ही उन्हें गिना जा सकता है। नाक में 'हरिचंद', मन की कायरता बिगड़ी। [2]