जद्यपि हम सब भाँति ही

Bharatendu Granthavali — श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र

Verse 19 of 52

जद्यपि हम सब भाँति ही, कुटिल कूर मतिमंद। तदपि उधारहु देखि कै, अपनी दिसि नंद-नंद॥ - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (16) आख़िरकार, हम सब ऐसे ही हैं, कुटिल और जिद्दी। फिर भी मैंने ऋण देखा है, मेरे प्यारे नंद-नंद.. - श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, सबके भक्त (16)
जद्यपि हम सब भाँति हीजै जै श्रीवृंदावन देवी।