जै जै श्रीवृंदावन देवी।

Bharatendu Granthavali — श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र

Verse 20 of 52

जै जै श्रीवृंदावन देवी। जो देवन कौ देव कन्हाई, सौऊ जा पद सेवी॥ [1] अगम अपार जगत सागर के, जाके गुण गन खेवी। ‘हरीचंद’ की यहै बीनती, कबहूँ तो सुधि लेवी॥ [2] - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, विनय प्रेम पच्चासा (01) जय जय श्री वृन्दावन देवी। जो भगवान है वही कन्हाई है, सबका सेवक है। 'हरिचंद' की यही विनती है, कब सुमिरन करूं.. [2] - श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, विनय प्रेम पचासा (01)
जद्यपि हम सब भाँति हीजय जय जय जय जय श्री राधा