जय जय जय जय जय श्री राधा

Bharatendu Granthavali — श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र

Verse 25 of 52

(राग कान्हरा) जो पै श्री राधा रूप न धरतीं। प्रेम-पंथ जग प्रकट न हो तो ब्रज - बनिता कहा करतीं॥ [1] पुष्टिमार्ग थापित को करतो ब्रज रहतो सब सूनो। हरि लीला काके संग करते मंडल होते ऊनो॥ [2] रास मध्य को रमतो हरि संग रसिक सुकवि कह गाते। 'हरीचन्द' भव के भय सों भजि किहि के सरनहिं जाते॥ [3] - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, राग संग्रह (37) (राग कान्हड़ा) जो पै श्री राधा रूपता न धरति। यदि प्रेम का पंथ जग में प्रकट न हो, तो ब्रज - बनिता कह करतिन.. [1] पुष्टिमार्ग थपित को कर्ता ब्रज, बने रहो, सुनो सबकी। हरि लीला काके संग कराटे मंडल होत उनो.. [2] रस मध्यम को रामतो हरि संग रसिक सुकवि कहा जाता था। भाजी के पुत्र 'हरिचंद' बनने का डर नहीं है.. [3] - श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, राग संग्रह (37)
जद्यपि हम सब भाँति हीजद्यपि हम सब भाँति ही