जद्यपि हम सब भाँति ही

Bharatendu Granthavali — श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र

Verse 26 of 52

केवल पैये प्रेम में प्यारो ! नहीं ज्ञान में नहीं ध्यान में कर्म नेम ते न्यारो॥ [1] नहीं भारत में नहीं रामायण स्मृति वेदन में नाहीं। नहीं झगरे में नहीं युक्ति में नहीं मतभेदन माहीं॥ [2] नहीं मन्दिर में नहीं पूजा में नहीं घंटा की घोर। 'हरिचंद' वह बांध्यो डोले एक प्रेम की डोर॥ [3] - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, जैन कुतूहल (13) तुम्हें केवल प्यार मिले, प्रिय पुरुषों! न ज्ञान, न मन, न ध्यान, न कर्म, न नाम। [1] न भरत पुरुष, न रामायण स्मृति वेद, न मनुष्य। न कोई झगड़ालू है, न कोई चालबाज़ है, न कोई अपनी माँ से बिछड़ा है.. [2] न कोई मन्दिर में है, न कोई पूजा-पाठ करता है, न कोई कठिन घड़ी है। 'हरिचंद' वाह बंद्यो डोले एक प्रेम की दूर.. [3] - श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, जैन कुतुहल (13)
जय जय जय जय जय श्री राधाजद्यपि हम सब भाँति ही