जद्यपि हम सब भाँति ही

Bharatendu Granthavali — श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र

Verse 28 of 52

(सवैया) मनमोहन तें बिछुरी जबसौं, तन आँसुन सौं नित धोबती हैं। [1] 'हरिचन्द' जु प्रेम के फन्द परीं, कुल की कुल लाजहिं खोवती हैं॥ [2] दुःख के दिन कों कोऊ भाँति बितै, बिरहागन रैन सँजोवती हैं। [3] हमहीं अपनी दशा जानैं सखी, निसि सोवती हैं किधौं रोवती हैं॥ [4] - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम माधुरी (116) (सवैया) मनमोहन दास बिछुड़ी जाबासौं, तन अंसुन सौं नित धोरिस। [1] 'हरिचंद', प्रेम के आलिंगन में, कुल का मान सब खो जाता है.. [2] विरह में कितने लोग दुःखी दिन बिताये, दुःखी हैं। [3] अपनी-अपनी स्थिति है, जनैन सखी, निसि सोवती हैं, किधौं रोवति हैं। [4] - श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम माधुरी (116)
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