(कवित्त)
Bharatendu Granthavali — श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र
Verse 3 of 52
(कवित्त)
भजौं तो गुपाल ही कौं सेवौं तो गुपालै एक,
मेरो मन लाग्यो सब भाँति नंदलाल सों। [1]
मेरे देव देवी गुरु माता पिता बंधु इष्ट,
मित्र सखा हरि नातो एक गोपबाल सों॥ [2]
'हरीचंद' और सों न मेरो संबंध कछु,
आसरो सदैव एक लोचन विसाल सों। [3]
माँगों तो गुपाल सों न माँगों तो गुपाल ही सों,
रीझौं तो गुपाल पै औ खीझौं तो गुपाल सों॥ [4]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, विनय प्रेम पचासा (21)
(कविता) जब मैं गुपाल को पूजूंगा, तो मेरी सेवा कौन करेगा? मुझे ऐसा लग रहा है मानो मैं नंदलाल का बेटा हूं. [1] मेरे इष्ट, देवी, गुरु, माता-पिता, मित्र, इष्ट, सखा, सखा, हरि नाटो, गोपबल पुत्र.. [2] 'हरिचंद' और उनके पुत्र, न मेरे रिश्ते कच्छू, असारो सदा लोचन विशाल पुत्र। [3] मंगुन गुपाल का बेटा है, न मंगुन गुपाल का बेटा है, रिझौं गुपाल का पिता है और खिझौं गुपाल का बेटा है.. [4] - श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, विनय प्रेम पचासा (21)