नित नित होरी ब्रज में रहौ।
Bharatendu Granthavali — श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र
Verse 33 of 52
नित नित होरी ब्रज में रहौ।
विहरत हरि-सँग ब्रज-जुबतीगन, सदा अनन्द लहौ॥ [1]
प्रफुलित फलित रहौ वृंदावन, मधुप कृष्ण-गुन कहौ।
‘हरीचंद' नित सरस सुधामय, प्रेम-प्रवाह चहौ॥ [2]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, होली (79)
नित्य रात्रि ब्रज में निवास करें। विहारत हरि-संग ब्रज-जुबातिगण, सदा आनंद प्रदायक।।[1] कहो आनंदमय फलदायी वृन्दावन, मधुप कृष्ण-गुण। 'हरिचंद' सदैव मधुर है, प्रेम से भरा है... [2] - श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, होली (79)