रहौं मैं सदा जुगल-भुज छहियाँ।
Bharatendu Granthavali — श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र
Verse 40 of 52
रहौं मैं सदा जुगल-भुज छहियाँ।
अब मत छाँड़ौ राधा मोहन पकरि दीन को बहियाँ॥ [1]
सदा बसाओ श्री वृंदावन नित नव कुंजन महियाँ।
'हरीचंद' इक-रूप निबाहौ अब पन बिगरै नहियाँ॥ [2]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, प्रेम फुलवारी (78)
मैं सदा जुगला-भुज की छाया में रहूँ। राधा मोहन पकड़ी के दिन के पन्ने अब मत छोड़ना। [1] निशदिन श्री वृन्दावन बसाओ, नव कुंजन महिया। 'हरिचंद' मुझे अब वही भूमिका निभानी चाहिए लेकिन मैं इसे खराब नहीं करूंगा.. [2] - श्री भारतेंदु हरिश्चंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम फुलवारी (78)