उद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभ
Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव
Verse 10 of 131
(सवैया)
नित्यविहार अधार दुरयौ, मिहरी कैं महल टहल में आइबौ। [1]
कर्म ज्ञान भक्ति मुक्ति, वैकुण्ठ में बैठि कहाँ लगि धाइबौ॥ [2]
यहै सुनि लै ब्रज-रीति उरें, रस-रीति सौं प्रीति अनन्य कहाइबौ। [3]
विषयिन के लालच पै न सरै, श्रीबिहारिनदास उदास ह्वै गाइबौ॥ [4]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (31)
(सवैया) नित्यविहार अधर दुरयौ, मिहारी के महल ताहल में ऐबौ। [1] कर्म ज्ञान भक्ति मुक्ति वैकुण्ठ में बैठा, तूने मुझे कहाँ पाया? [2] याहै सुनि ला ब्रज-रीति उरेन, रस-रीति सौं प्रीति आई खैबौ। [3] विषयों का लोभ सराय में नहीं है, श्री बिहारिन दास समलैंगिक होने पर दुखी हैं.. [4] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के काव्य-सवैया (31) श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि सभी का सार, यह नित्यविहार रस परम वास्तु है, जो नित्यविहारिणी जू (राधा रानी) के निजी महल में निकटता से ही उपलब्ध होता है। [1]