उद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभ

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 11 of 131

(सवैया) जप संजम नेम निषेध विधी व्रत, तौ लगि जौ परस्यो न हिया। [1] पुनि पावत ही सुख स्वाद कछू, बिसरे सुख देह किया न किया॥ [2] ‘श्रीबिहारिनिदासि’ मनोहर कौ सुख, सर्वसु लै हित हाथ दिया। [3] कोऊ कैसीयै कोटि कहो मुख की, मन प्रेम तो नेम रहै न भिया॥ [4] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (34) (सवैया) संजम का जप करें, उपवास की निषिद्ध विधि का पालन करें, जो परसों नहीं किया गया हो। [1] जनेऊ पाकर ही मैं सुख का स्वाद नहीं चख पाता, मैं अपने शरीर का सुख नहीं भूला हूँ। [2] 'श्री बिहार निदासी' ने सबके हित के लिए प्रियतम को सुख दिया है। [3] मुख से चाहे कितने भी शब्द निकलें, हृदय से प्रेम नहीं निकलता.. [4] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत की काव्य-साधना (34)
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