मेरे गति ब्रजपति कैं ब्रजवासी

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 103 of 131

कृष्ण चरित्र त्रिधा त्रिभुवन में, बहु भक्ति भेद विस्तार। जहाँ जु रस तहाँ तिहिं वैस, सुख देति सबनि उदार॥ [1] गाय, ग्वाल, गोप, गोपीजन न्यारौ ब्रज व्यौहार। सबते दूर दुर्जन दुर्यौ क्यों सुलभ होत सुकुमार॥ [2] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी कृष्ण का चरित्र, त्रिधा त्रिभुवन पुरुष, बहुभक्ति भेद का विस्तार। जहाँ आनंद है वहाँ प्रसन्नता भी है, सभी उदार हैं। जब आप किसी बुरे व्यक्ति से दूर रहेंगे तो आप सहज क्यों रहेंगे? [2] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी के वचन
कोऊ मदमाते भांग के, कोउ अमल अफीम,नामी नाम न भावई