उद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभ

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 12 of 131

(सवैया) पिता-सुत-बंधु कहा सम्बंध, सबै जग अंध न गंध सुहातौ। [1] कहा बसें गाउँ कहा लिये नाउँ, लहै नहि ठांउँ फिरै बिलखातौ॥ [2] श्रीबिहारिनिदासि सुहाग बिना जु, सिंगार कौं भारु छिया करि हांतौ। [3] लालच गोद लियो सुत सौति को, प्रेम बिना न विराजत नातौ॥ [4] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (35) (सवैया) कहां बाप-दामाद का नाता, सब जग अंधिया, न गंध सुहावनी। [1] गायें कहां हैं, गायें कहां हैं, मैं घूम नहीं रहा हूं.. [2] श्री बिहार निदासी सुहाग बिनु जू, सिंगार, कोई कुछ नहीं कर सकता। [3] लोभ देव लियो, सुत सौति को, बिनु प्रेम बिनु ना जिया.. [4] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के काव्य-सवैया (35)
उद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभनामी नाम न भावई