नवल वृन्दावन नवल बसन्त
Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव
Verse 112 of 131
(राग बसंत)
नवल वृन्दावन नवल बसन्त। [1]
नव द्रुम बेलि केलि नव कुंजनि नवल कामिनी कंत। [2]
नव अलि अलक झलक नव कोकिल नव सुर मिलि बिलसंत। [3]
नव रस रसिक बिहारिनिदासी कैं नव आनँदहिं न अंत॥ [4]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, रस के पद (122)
(राग बसंत) नवल वृन्दावन नवल बसंत। [1] नव ढोल बेली केली नव कुंजनि नव कामिनी जारी। [2] नव अली अलक झलक नव कोकिल नव सूर मिली बिलसंत। [3] नव रस रसिक बिहारिनिदसि कैं नव आनंदहिं न अंत.. [4] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, रस के छंद (122)