साधन श्रम न कछु किये न कछु करने जोग

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 123 of 131

श्री वृन्दावन जब देखौं तबहिं, नयौ नित लेत प्रेम उपजाई। या रंग रस में मन झूमई तौ, भूली पाछिलौ जाइ॥ - श्री बिहारिन देव, बिहारिन देव जी की वाणी, रस के पद (175) मैं जब भी श्री वृन्दावन को देखता हूँ तो मेरा प्रेम बढ़ता ही जाता है। या रंग रस मन झुमै तौ, भूलि पछिलौ जय.. - श्री बिहारिन देव, बिहारिन देव जी की वाणी, रस के छंद (175)
श्रीबिहारिनदास को यह बिसन राधा नाम हृदय धरि वसि रहैं वृन्दावन ।श्रीवृन्दावन निधि सब सुख धांम। [1]