ता व्रज के आवरण सुनि गोपी

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 128 of 131

ता व्रज के आवरण सुनि, गोपी गाय अरु ग्वाल। तिन हूं ते बिहरत दुरहुँ, रसिकन के प्रतिपाल॥ -श्री बिहारिन देव, श्री बिहारी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (664) सुनो व्रज के अवतार, गोपी गे और ग्वाल-बाल। तीन हूं ते बिहार दुरहुं, रसिकान के प्रतिपल.. - श्री बिहारिन देव, श्री बिहारी देव जू की आवाज, सिद्धांत के सखा (664)
स्वर्ग नर्क की आस न त्रास । रसिकवर रसिकनी रस रासि