रसिकवर रसिकनी रस रासि

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 14 of 131

आरति कीजै सुंदरवर की। नागर नवल निकुंज इन्दु जुग, अखिल ताप तम हर की॥ [1] नव विलास मृदु हास मनोहर, श्रवत सुधा सुख कर की। ‘श्रीबिहारीदास’ लोचन चकोर नित, अंस प्रिया भुज धर की॥ [2] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (39) सुंदरवर की आरती की जाती है. नगर नवल निकुंज इंदु जुग, अखिल तप तम हर की।।[1] नव विलास मृदु हस मनोहर, श्रवत सुधा सुख कर की। 'श्री बिहारीदास' लोचन चकोर नित, अंस प्रिया भुज धार की.. [2] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के छंद (39)
नामी नाम न भावईसुनि मन मधुकर ज्ञान सिखाऊँ।