सुनि मन मधुकर ज्ञान सिखाऊँ।

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 15 of 131

सुनि मन मधुकर ज्ञान सिखाऊँ। चरन कमल रति रुचि उपजाऊँ॥ [1] तिहि पथ चलौ जु बहुरि न आऊँ। जनम मरन भै भर्म भुलाऊँ॥ [2] बसि वृन्दावन उत्तम ठाँऊँ। सतसंगति परमार्थ पाऊँ॥ [3] नित दंपति संपतिहि दिखाऊँ। श्रीबिहारिनिदासि भई गुन गाऊँ॥ [4] - श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (40) सुनो, अपना हृदय मीठा करो और ज्ञान सीखो। चरण कमल रुचि से परिपूर्ण हैं। [1] आइये इस पथ पर चलें। मैं जन्म और मृत्यु का भ्रम भूल जाता हूँ। [2] वृन्दावन सर्वोत्तम स्थान है। सत्संगति परमार्थ पं..[3] मैं स्वयं नीता दानपति संपतिहि हूं। श्री बिहारिनिदसी भाई गुण गौं.. [4] - श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांतों के सिद्धांत (40)
रसिकवर रसिकनी रस रासितीरथ सकल लोक बंकुण्ठ तैं