उद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभ

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 30 of 131

(सवैया) श्री हरिदास के गर्व भरे, अमनैंक अनन्य निहारिनी के। महा-मधुरे-रस पाँन करें, अवसाँन खता सिलहारनि के॥ [1] दियौ नहिं लेहि ते मांगहि क्यों, बरनैं गुन कौंन तिहारिनि के। किये रहैं ऐंड बिहारी हूँ सौं, हम वेपरवाह बिहारिनी के॥ [2] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (111) (सवैय्या) आमानाका श्री हरिदास के गौरव के अनन्य प्रशंसक हैं। करेन महा-मधुरे-रस करो, सिलहरिणी का अमृत खाओ.. [1] धन क्यों नहीं मांगते, तिहारिणी के गुण क्या हैं। और मैं एक बिहारी हूं, हमें बिहारिणी की चिंता है.. [2] - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत की काव्य साधना (111)
उद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभहरि मोहिं यों अपनाय लियौ।