रुचे मोहिं ब्रजबासिन के टूक।
Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव
Verse 40 of 131
रुचे मोहिं ब्रजबासिन के टूक।
जारत तृन अभिमान अविद्या, मनहुँ अग्नि के ऊक॥ [1]
काजहि काज कहा करकच सों, रह्यौ मौन ह्वै मूक।
श्रीबिहारीदास हरिदास दई बुद्धि, गई हिये की हूक॥ [2]
- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (142)
मोहिं ब्रजबासिन की कविताएँ रोचक हैं। जरत तृण अभिमान अविद्या, मनहुं अग्नि के उक.. [1] काजहि काज कहा कर्कच पुत्र, रहयौ मौन हवै मूक। श्री बिहारीदास हरिदास ने ज्ञान दिया, हूक गाया.. [2] - श्री बिहारिन देव, श्री बिहारी देव जी के वचन, सिद्धांत (142)