मेरे विषै विसन वर वाम

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 41 of 131

मोहिं ब्रजबासिन सों बनि आई। जिनके तन मन बसत निरन्तर स्यामा स्याम सहाई॥ [1] निसिबासर निरखत नैननि सुख विसद बिहार सदाई। वारों मुक्ति पदारथ चारों चतुर्दस लोक बडाई॥ [2] जिनकी चरन रेनु जाँचत ऊधो ब्रह्मा हूँ न पाई। तिनकों सर्वसु दियो अपनपौ जानि सिरोमनि राई॥ [3] आसन असन बसन संभासन दरस परस सुखदाई। श्री बिहारी दास बड़भागी अति अनुरागी की बलि जाई॥ [4] -श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की बानी, सिद्धान्त के पद (144) मोहिं ब्रजबासिन का पुत्र था। जिनका तन और मन सदा स्याम स्याम सहाई में बसता है। [1] निसासर निरखत नैननि सुख बिहार सदाय। वरो मुक्ति पदारथ चारो चतुर्दस लोक बदाय.. [2] जिनके चरणों में रेनु जंचत उधो ब्रह्म हूं न पै। तिनकोण सर्वसु दियो अपनपौ जानि सिरोमनि रै..[3] असं असं बसं स्नेहसंद दरस पारस सुखदाई। श्री बिहारी दास बड़भागी अति अनुरागी की बाली जय.. [4] -श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की बानी, सिद्धांत के पद (144)
रुचे मोहिं ब्रजबासिन के टूक।नामी नाम न भावई