मेरौ मन श्रीवृन्दावन अटक्यौ।
Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव
Verse 46 of 131
मेरौ मन श्रीवृन्दावन अटक्यौ।
राख्यौ श्रीहरिदास विपुल बल भूलि न इत उत भटक्यौ॥ [1]
बिसरे बिस्व विलास त्रास उपहासनि नेकु न मटक्यौ।
उपज्यौ अति आनंद हिये सुख सुफल प्रेम लै लटक्यौ॥ [2]
दियौ प्रसाद प्रतीति प्रीति के महल कुमहलन हटक्यौ।
श्रीबिहारीदास दंपति सुख चैननि नैंन मधुर रस गटक्यौ॥ [3]
- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (154)
मेरा मन श्री वृन्दावन में अटक गया। राखायो श्री हरिदास, अपार शक्ति मत भूलो तहां फिरो।।[1] बिसरे बिस्वा विलास त्रास उपासनि नेकु न मत्क्याउ। आपको अपार खुशी, खुशी, सफलता और प्रेम का आशीर्वाद प्राप्त है.. [2] दियौ प्रसाद, प्रति प्रीति के महलन हातकयौ। श्री बिहारीदास दानपति सुख चैननि नैन मधुर रस गटक्यौ.. [3] - श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत पद (154)