पंडित या रस तें बचे, ज्यौं बिझुकै मृग रोझ।

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 62 of 131

पंडित या रस तें बचे, ज्यौं बिझुकै मृग रोझ। नवै न अचवन पावही, वेद लदैं सिर बोझ॥ - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (322) पण्डित, हाँ, अभी दस रस बाकी हैं, मानो हिरन प्रति दिन डरता है। न नवै न अछावन पावहि, वेद सिर पर बोझा। - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के मित्र (322)
नामी नाम न भावईमेरे गति ब्रजपति कैं ब्रजवासी