मेरे गति ब्रजपति कैं ब्रजवासी
Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव
Verse 63 of 131
रज छाँड़ै रज पाइयै, रज राखैं रज जाइ।
रज सौं रजहि पिछाँटि लै, रज सौं रसिक कहाइ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (331)
राज छंदै राज पइयाई, राज राखैं राज जय। राज सौं राजी पिचांति लाई, राज सौं रसिक कहै.. - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की आवाज, सिद्धांत के मित्र (331)