रहैं अंग संग अनंग हरैं मनु

Biharin Dev Vani — श्री बिहारिन देव

Verse 8 of 131

(सवैया) रहैं अंग संग अनंग हरैं मनु, नीरद नील दामिनी दमकैं। [1] बरनी न परै छवि कौ कवि तै, सत सेस महेस की बुद्धि समकैं॥ [2] श्रीबिहारी-बिहारिनिदासि निकुंजन, निरखत ही सुख प्रेम रमकैं। [3] चितै वर राज बिहारिनि नित्त, अद्भुत जोति चिबुक चमकैं॥ [4] - श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, रस के सेवैया (30) (सवैया) मैं शरीर के साथ रहता हूं, शरीर अकेला है, मनु अकेला है, और दामिनी चुप है। [1] कवि अन्य छवियों से रहित है, महेश की बुद्धि सत्य में लीन है। [2] श्रीबिहारी-बिहारिनीदासी निकुंजन, निरखत हि सुख प्रेम रामकैन। [3] चितई वर राज बिहारिणी नित, अदभुत जोति चिबुक चमकैन.. [4] - श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, रस के सेवक (30)
मेरे गति ब्रजपति कैं ब्रजवासीदेस विदेश भिखारिया, जहाँ जाइ तहाँ भीख।