मनमोहन जाकी दृष्टि परत

Braj Vihara — श्री नारायण स्वामी

Verse 12 of 40

(राग सोरठ) जाहि लगन लगी घनस्यामकी। धरत कहूँ पग, परत हैं कितहूँ, भूल जाय सुधि धाम की॥[1] छबि निहार नहिं रहत सार कछु, घटि पल निसिदिन याम की। जित मुँह उठे तितै ही धावै, सुरति न छाया घाम की॥ [2] अस्तुति निन्दा करौ भलै ही, मेंड़ तजी कुल ग्राम की। ‘नारायण’ बौरी भइ डोलै, रही न काहू काम की॥ [3] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, युगल छदम लीला (6) (राग सोरठा) जाहि लगन लगी घनस्यामाकी। धरती पर कहां जाऊं, परतों में कहां जाऊं, यादों का ठिकाना भूल जाऊं क्या..[1] छवि देखना नहीं रुकता जनाब, हर पल यम का दिन है। मुख ऊपर उठते ही भाग जाता है, दुःख का साया नहीं रहता। [2] अस्तुति की निंदा करना पूरे गांव के लिए बेहतर है। 'नारायण' बौरि भाई डोलै, रहि न काहू काम की.. [3] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, युगल छदम लीला (6)
गोविन्द गोविन्द गोविन्द भज रेप्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूंहै