प्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूंहै

Braj Vihara — श्री नारायण स्वामी

Verse 13 of 40

(राग मल्हार) कदम तरे ठाढ़े दोऊ बतरावें। परत फुहार पवन झकझोरत, अब कित भाजिके जावें॥ [1] भवन दूरि बन ठौर न दीखत, जहाँ निज बसन दुरावें। नारायण कछु दूरि जायके, फेरि बगदि वहिं आवें॥ [2] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (6) (राग मल्हारा) कदम तारे ठाड़े दू बतारावें। बारिश की परतें, हवाएं चल रही हैं, अब कितने लोगों के साथ चलें.. [1] दूर है बिल्डिंग, जहां दिखता है हमारा घर. कछू गए नारायण, बागड़ी फिर लौटे.. [2] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (6)
मनमोहन जाकी दृष्टि परतकरू मन, नंदनँदनको ध्यान