गोविन्द गोविन्द गोविन्द भज रे

Braj Vihara — श्री नारायण स्वामी

Verse 17 of 40

(राग कालिंगड़ा) मैं कहा जानूँ कुंजबिहारी। किहि कारण रूठी है तुम सों, चंद्रमुखी वृषभानकुमारी॥ [1] जब ते उठी प्रिया सोवत तें, तबही सों मन में रिस भारी। ना जानूँ कछु सपने में उन, देखी है करतूति तिहारी॥ [2] ठाड़े रहौ भीतर मति जावौ, प्रीतम मानो कही हमारी। नारायण जो भुज गहि रोकूँ, फिर कहा बात रहे गिरिधारी॥ [3] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मानलीला (10) (राग कलिंगड़ा) मैं कहता हूं जानु कुंजबिहारी। किसी कारण से तुम पुत्र उदास हो चन्द्रमुखी वृषभकुमारी.. [1] जब प्रिया नींद से जागी तो मेरे पुत्र का हृदय भारी हो गया। क्या पता, उसके मन में कोई सपना हो, मैंने उसकी हरकतें देखी हैं.. [2] शांत रहो, अंदर मत जाओ, मुझे प्यार करो, ऐसा महसूस करो कि मैं कहीं हूं। नारायण, मैं भुज में रहूँगा तो गिरिधारी कहाँ बाँट रहा है.. [3] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मनलीला (10)
प्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूंहैमन चेतु नहीं पछितावैगो