मनमोहन जाकी दृष्टि परत

Braj Vihara — श्री नारायण स्वामी

Verse 19 of 40

(राग सोरठ व जिला) मनमोहन जाकी दृष्टि परत, ताकी गति होत है और और। न सुहात भवन तन अशन वसन, बन ही कूँ धावत दौर दौर॥ [1] नहिं धरत धीर हिय विरह पीर, ब्याकुल भई भटकत ठौर ठौर। कबहूँ अँसुवन भरि नारायण, मग झाँकत डोलत पौर पौर॥ [2] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, युगल छदम लीला (5) (राग सोरठ वी जिला) मनमोहन जाकी दृष्टि परत, ताकि गति हो गरम और। न घर अच्छा लगता है, न घर में आसन अच्छा लगता है, न भाग-दौड़ अच्छी लगती है। [1] न धरती धीर है, विरह दुखदायी है, व्याकुल भाई दर-दर भटक रहा है। कबहुं अंसुवन भारी नारायण, मग झनकत डोलत पौर.. [2] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, युगल छदम लीला (5)
मन चेतु नहीं पछितावैगोप्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूंहै