मोहि मति रोकै री तू एरी ब्रज नागरी
Braj Vihara — श्री नारायण स्वामी
Verse 21 of 40
(राग झिंझोटी)
मोहि मति रोकै री तू, एरी ब्रज नागरी।
रूप की निधान है तू, गुणन की खान है तू,
तेरी सम कौन आज, तेरो बड़ो भाग री॥ [1]
कहै तो मैं नृत्य करूँ, बांसुरी में राग भरूं,
कान्हरो किदारो भैरों, सोरठ बिहाग री।
तू तो सदा उपकारी, हित की करनहारी,
आज नारायण मोसों, क्यों राखै तू लाग री॥ [2]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सम्भ्रम-मानलीला (11)
(राग झिंझोटी) मोहि माटी रोकै री तू, एरी ब्रज नगरी। तुम ही रूप के समाधान हो, तुम ही गुणन की खान हो, कौन तुम्हारे जैसा है, कौन तुम्हारे जैसा है... [1] तुम कहो तो नाचूँ, बांसुरी में सुर भरूँ, कान्हारो किदारो भैरों, सोरठ बिहाग री। You are always a giver, a giver, today Narayan Moson, why do you keep me... [2] - Shri Narayan Swami, Braj Vihar, Sambhram-Manleela (11)