प्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूंहै

Braj Vihara — श्री नारायण स्वामी

Verse 30 of 40

(राग मल्हार) सघन बन झूलें दोऊ सुकुमार। हिय हरषत छबि निरखि परस्पर, छिन छिन बाढ़त प्यार॥ [1] कबहुँ मुदित मन तान लेत मिलि, होत सखी बलिहार। नारायण द्रुम बेलि सुहावनि, हरित किये श्रृंगार॥ [2] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (24) (राग मल्हारा) झूले घनारे, दोऊ नाज़ुक। ओह सुंदर और पारस्परिक प्रेम, बिना किसी दृश्य, सूक्ष्म और मर्मज्ञ प्रेम के। [1] जब तन और मन मुझसे मिलने को बिछते हैं, मित्र मुझ पर अपना बलिदान देता है। नारायण द्रुम बेली सुहावनि, हरित किये श्रृंगार.. [2] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (24)
साँवरे की जिन निरखी मुसिक्यानसखि नँदलाल न आवन पावै