साँवरे क्यों मोसों रिस मानी

Braj Vihara — श्री नारायण स्वामी

Verse 32 of 40

(राग झंझोटी) साँवरे क्यों मोसों रिस मानी। तेरे काज घरबार त्यागि के, गलियन फिरत दिवानी। [1] लोकलाज कुलरीति प्रीति जग, इन्हूँ को दियो पानी। नारायण अब तौ हँसि चितवौ, एरे रूप गुमानी॥ [2] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, युगल छदम लीला (08) (राग झंझोटी) काले लोग आँसू क्यों बहाते हैं? तुम अपना घर छोड़कर सड़कों पर घूमने के दीवाने हो। [1] लोकलाज कुलारिति प्रीति जग, पानी पिलाय। नारायण अब तौ हंसी चितावौ, एरे रूप गुमानी.. [2] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, युगल छदाम लीला (08)
सखि नँदलाल न आवन पावैसुन्दर अनूप जोरी, अति मन को भावती