सुन्दर अनूप जोरी, अति मन को भावती

Braj Vihara — श्री नारायण स्वामी

Verse 33 of 40

(राग यमन एवं जिला) सुन्दर अनूप जोरी, अति मन को भावती। देखी मैं आज मग में, कुंजन सों आवती॥ [1] अँग अँग देत शोभा, भूषण जड़ाऊ आली। नयनन में सोहै काजर, अधरन पै पान लाली॥ [2] प्रीतम के कांधे कर धर, प्यारी अनन्द सों। हँसि हँसि के करत बातैं, मुख ललित चन्दसों॥ [3] पग धरत हौंलें हौंलें, गति देख हंस लाजैं। नूपुर परम मनोहर, अति मधुर मधुर बाजैं॥ [4] या भाँति सों मगन ह्वै क्रीड़ा करत हैं दोऊ। नारायण रसिकजन बिन, ये रस न जाने कोऊ॥ [5] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (29) (राग यमन और जिला) सुन्दर अनुप जोरि, अति मन को भवति। देखि में अज मग में, कुंजन पुत्र अवती..[1] अंग अंग देत शोभा, भूषण जड़ौ अली। नयनन मन सोहै काजर, अधरन पै पान लाली।।[2] अपने प्रिय के कंधों का किनारा पकड़ो, प्रिय आनंद। हंसो और अपनी चाल बताओ, मुख ललित चंदासन.. [3] चलो जमीन पर चलो, चलो और चाल देखकर हंसो। नूपुर अति सुन्दर, अति मधुर, मधुर ध्वनि... [4] अथवा बेटे की ख़ुशी में खेल रहे जोड़े की तरह। नारायण रसिकजन बिन, ये रस न जाने कु.. [5] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (29)
साँवरे क्यों मोसों रिस मानीप्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूंहै