प्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूंहै
Braj Vihara — श्री नारायण स्वामी
Verse 34 of 40
तजि कुतर्क जो नित सुनै, यह लीला रसपुञ्ज।
नारायण ताकूं युगल, वास देत निज कुंज॥
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, नवदुलहिन लीला (18)
जो कुतर्क मैं प्रतिदिन सुनता हूँ वह लीला की गड़गड़ाहट के समान है। अपने ही बगीचे में निवास दे रहे नारायण टाकुन दम्पति.. - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, नवदुलहिन लीला (18)