या साँवरे सों मैं प्रीति लगाई

Braj Vihara — श्री नारायण स्वामी

Verse 38 of 40

(राग काफी और धनाश्री) या साँवरे सों मैं प्रीति लगाई। कुल कलंक ते नाहिं डरूँगी, अब तौ करूं अपने मन भाई॥ [1] बीच बजार पुकार कहूँ मैं, चाहे करौ तुम कोटि बुराई। लाज म्रजाद मिली औरन कूं, मृदु मुसिकान मेरे बट आई॥ [2] बिन देखे मनमोहन को मुख, मोहि लगत त्रिभुवन दुखदाई। नारायण तिनकूँ सब फीको, जिन चाखी यह रूप मिठाई॥ [3] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सखी अनुराग लीला (3) (राग काफी और धनाश्री) या मुझे काले बेटे से प्यार हो जाएगा। मैं किसी कलंक से नहीं डरूंगा, अब जो चाहूं वही करूंगा भाई.. [1] मैं तुम्हें ऊंचे स्वर से पुकारूंगा, चाहे तुम कुछ बुरा ही करो। लाज मरजद मिलि और कुन, मृदु मुसिकन मेरे बट ऐ.. [2] मनमोहन मुख देखे बिना, मोहि लगत त्रिभुवन साधदै। नारायण की तिनकुम सब फिको, जो कोई चाहे इस रूप की मिठाई.. [3] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, सखी अनुराग लीला (3)
प्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूंहैमन चेतु नहीं पछितावैगो