आवौ री यह शोभा
Braj Vihara — श्री नारायण स्वामी
Verse 4 of 40
(राग हिंडोरा)
आवौ री यह शोभा निहारें।
नन्दलाल वृषभानुनन्दिनी, झूलि रहे गरबैयां डारें॥ [1]
परत फुहार विपिन हरियाली, वन पक्षी मृदु वचन उचारें।
अति निरमल जल भरे सरोवर, फूले कमल भ्रमर गुंजारें॥ [2]
पवन झकोर उड़त प्रिय को पट, झट प्रीतम निज हाथ समारें।
नारायण इनकी या छबि पै, आज सखी हम सरबस वारें॥[3]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (14)
(राग हिंडोरा) अवौ री हाँ, सौंदर्य देखो। नंदलाल वृषभानुनंदिनी, झूली रहे गरबइयां डारेन.. [1] परत स्प्रे विपिन हरियाली, वन पक्षी कोमल वचन बोलते हैं। झील अत्यंत साफ पानी से भरी है, खिले हुए कमल गुंजन की ध्वनि करते हैं। [2] हवा चलती है और प्रियतम के पैरों को फैला देती है, प्रियतम तुरंत उन्हें अपनी बांहों से गले लगा लेता है। नारायण अपनी ही छवि में हैं, आज हम सबका एक मित्र है..[3] - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (14)