हमें बृजराज लाड़िले सों काज
Govind Svami Vani — श्री गोविन्द स्वामी
Verse 13 of 26
(राग गौरी)
कहा करों बैकुंठहि जाय।
जहां नहीं वंशीवट यमुना गिरिगोवर्धन नन्द की गाय॥ [1]
जहां नहीं यह कुंज लता द्रुम मंद सुगंध बहत नहीं वाय।
कोकिल हंस मोर नहीं कूजत, ताको बसिबो काहि सुहाय॥ [2]
जहाँ नहीं वंशी धुनि बाजत कृष्ण न पुरवत अधर लगाय।
प्रेम पुलक रोमांच न उपजत, मन वच क्रंम आवत नहीं धाय॥ [3]
जहाँ नहीं यह भुवि वृन्दावन, बाबा नन्द यशोमति माय।
'गोविन्द' प्रभु तजि नन्द सुवन को, ब्रज तजि वहाँ मेरी बसै बलाय॥ [4]
- श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (574)
(राग गौरी) बोलो वैकुण्ठहि जय। जहाँ वंशीवट नहीं, वहाँ यमुना को गिरिगोवर्धन नन्द की कृपा प्राप्त है। [1] जहाँ लताओं का झुरमुट नहीं होता, वहाँ हल्की सुगंध की प्रचुरता नहीं होती। न कोयल है, न हंस है, न मोर है, वह स्थान अच्छा नहीं है.. [2] जहाँ न वंशी धुन है, न कृष्ण है, न प्राचीनता है। प्रेम पुलक रोमांस नहि उपजे, मन वाच क्रनम नहि आवत धाय.. [3] जहां नहिं यम भुवि वृन्दावन, बाबा नंद यशोमति मय। 'गोविंद' प्रभु तजि नंद सुवन को, ब्रज तजि वहां म्हारो बसै बलाय.. [4] - श्री गोविंद स्वामी, श्री गोविंद स्वामी जी की वाणी (574)