आजु बनी री कुञ्जेश्वरी रानी
Govind Svami Vani — श्री गोविन्द स्वामी
Verse 17 of 26
(राग केदारो)
लालन गिरिधारी नवल कुंजबिहारी।
अंग अंग पर मनमथ कोटिक वार डारी॥ [1]
संग नवल नारी वृषभानु की दुलारी।
सुरति केलि अंग अंग सुखकारी॥ [2]
ग्रथित बेनी पियारी चंपक जाति निवारी।
परसत उर पुलकित भरत अंकवारी॥ [3]
कंठ सुघर भारी मधुर तान संचारी।
दंपति राग रंग राख्यो 'गोविंद' बलि बलिहारी॥ [4]
- श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी
(राग केदारो) लालन गिरिधारी नवल कुंजबिहारी। अंग अंग पर मन्मथ कोटिक वर डारि। [1] वृषभानु की प्रेयसी के साथ नवल स्त्री। सुरति केलि अंग अंग सुहाकारी.. [2] ग्रथित बेनी प्यारी छनपाक जाति निवारण। परसत उर पुलकित भरत अंकावारी।।[3] कंठ सुघर भारी मधुर तन स्नचारी। युगल रग रंग राख्यो 'गोविंद' बलि बलिहारी.. [4] - श्री गोविंद स्वामी, श्री गोविंद स्वामी जी की वाणी