काले ही मोहन, काले ही सोहन

Govind Svami Vani — श्री गोविन्द स्वामी

Verse 18 of 26

(राग धनाश्री) लाल ही लाल के लाल ही लोचन, लालन के मुख लाल ही बीरा। [1] लाल बनी कटि काछनी लाल की, अरु लाल के सीस पे लाल ही चीरा। [2] लाल ही बाग बने अति सुन्दर, लाल खड़े जमुना जी के तीरा। [3] गोविन्द यों प्रभु सोभा बखानत, लाल के कण्ठ बिराजत हीरा। [4] - श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (राग धनाश्री) लाल ही लाल के लाल ही लोचन, लालन के मुख लाल ही बीरा। [1] कटे लाल का बना, सिर कटे लाल लाल। [2] लाल थैली अति सुन्दर, जमुना जी का मुकुट लाल खड़ा। [3] ऐसे विराजते हैं गोविंद प्रभु, हीरे जैसा गला। [4] - श्री गोविंद स्वामी, श्री गोविंद स्वामी जी के शब्द लाल जी [श्रीकृष्ण] की आंखें लाल और मुंह में लाल पान है। [1] लाल जी की कमर पर लाल कमरबंद और सिर पर लाल कपड़ा बंधा हुआ है। [2] लाल जी यमुना के तट पर एक अत्यंत सुन्दर लाल उद्यान में खड़े हैं। [3] भगवान की शोभा का वर्णन करते हुए श्री गोविंद दास कहते हैं कि उस पुत्र के गले में मृगमाला पड़ी हुई थी। [4]
आजु बनी री कुञ्जेश्वरी रानीआजु बनी अति सारंग नैनी