मुख सों मुख मिलाय देखत आरसी

Govind Svami Vani — श्री गोविन्द स्वामी

Verse 20 of 26

(राग विलावल) मुख सों मुख मिलाय देखत आरसी। विकसित नील कमल ढिग उदित भयौ कैधौं शशी॥ [1] निरख वदन मुसकाय परसपर करत बिहँसि गिरिजात अंक हँसी। गोविन्द प्रभु प्यारी जू परस्पर देखियत परे प्रेम बसी॥ [2] - श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (405) (राग विलावाला) मुख पुत्र मुख मिलाय देहात अरसी। विकसित नील कमल ढिघ उदित भयउ कैदौं शशी..[1] निरख वदन मुस्कय प्रत्यक्ष विषय बिहांसी गिरिजत संख्यात्मक हांसी। गोविंद प्रभु प्यारे, प्रेम परस्पर दृष्टि परे रहे.. [2] - श्री गोविंद स्वामी, श्री गोविंद स्वामी जी के वचन (405)
आजु बनी अति सारंग नैनीकाले ही मोहन, काले ही सोहन