ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि
Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 16 of 43
(राग सारंग)
बनी वृषभानु नंदिनी आजु।
भूषन वसन विविध पहिरे तन पिय मोंहन हित साजु॥ [1]
हाव भाव लावन्य भृकुटि लट हरति जुवति जन पाजु॥
ताल भेद औघर सुर सूचत नूपुर किंकिनि बाजु॥ [2]
नव निकुंज अभिराम स्याम सँग नीकौ बन्यौ समाजु।
(जै श्री ) हित हरिवंश विलास रास जुत जोरि अविचल राजु॥ [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (48)
(राग सारंगा) बानी वृषभानु नंदिनी आजु। भूषण वासन, विविध वस्त्र, अंग-विन्यास, मोहन हित सजु.. [1] भाव-भंगिमा, भौहों का सौंदर्य, गुँथे हुए बाल, जुवति जन पाजु.. ताल भेद, औघड़ सूर, सुचत नूपुर, किंकिनी बाजु.. [2] नव निकुंज, अभिराम स्याम संग, निकौ बनायौ समाजु। (जय श्री) हित हरिवंश विलास रस जुट जोरि अविचल राजू.. [3] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (48)