बनी श्रीराधा मोहन की जोरी
Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 17 of 43
(राग सारंग)
चलि सुंदरि बोली वृंदावन।
कामिनि कंठ लागि किन राजहि, तूँ दामिनि मोंहन नौतन घन ॥ [1]
कंचुकी सुरंग विविध रँग सारी, नख जुग ऊन बने तरे तन।
ये सब उचित नवल मोहन कौं, श्रीफल कुच जोवन आगम धन॥ [2]
अतिसै प्रीति हुती अंतरगत, (जैश्री) हित हरिवंश चली मुकुलित मन।
निविड़ निकुंज मिले रस सागर, जीते सत रति राज सुरत रन॥ [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (44)
(राग सारंग) चलो सुन्दरी बोली वृन्दावन। कामिनी कंठ लागी की रजही, तू दामिनी मोहन नौतन घन.. [1] भिन्न-भिन्न रंगों की कुंचुकी सुरंग, उनके शरीर में तारों से बनी कील जग। ये सभी उपयुक्त हैं नवल मोहन, यानी क्विंस, कुछ युवा अगम धन। [2] अतिसै प्रीति हुति अंतरगत, (जयश्री) हित हरिवंश चली बुदुलित मन। कोमल निकुंज मिले रस सागर, जीते सत रति राज, भागे सूरत.. [3] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (44)