प्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूंहै

Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 18 of 43

(राग मल्हार) [वर्षा समय] देखौ माई सुंदरता की सीवाँ। व्रज नव तरुनि कदंब नागरी, निरखि करतिं अधग्रीवाँ॥ जो कोउ कोटि कलप लगि जीवे रसना कोटिक पावै। तऊ रुचिर वदनारबिंद की सोभा कहत न आवै॥ देव लोक भूलोक रसातल सुनि कवि कुल मति डरिये। सहज माधुरी अंग अंग की कहि कासौं पटतरिये॥ (जै श्री) हित हरिवंश प्रताप रूप गुन वय बल स्याम उजागर। जाकी भ्रू विलास बस पसुरिव दिन विथकत रस सागर - हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (52) (राग मल्हारा) [बरसात का समय] मेरे सौंदर्य की सीवन देखो। व्रज नव तरूणि कदम्ब नागरी, निरखि कर्तिन अधग्रीवन.. जो एक करोड़ कल्पों में रहता है, उसे एक करोड़ रसना प्राप्त होती है। तब रुचिर वदनारबिन्द की शोभा न आयेगी... देवलोक भूलोक रस्तल सुनि कवि कुल मति डारिये। पता लगाएं सहज माधुरी कहां स्थित है.. (जय श्री) हित हरिवंश प्रताप रूप गुण वे बल स्याम उजागर। जाकी भारु विलास बास पसुरिव दिन विकट रस सागर - हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (52)
बनी श्रीराधा मोहन की जोरीप्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूंहै