प्यारी नित ऐसे ही तुमें निहारूंहै
Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 19 of 43
(राग मल्हार) [वर्षा समय]
देखौ माई अबला के बल रासि।
अति गज मत्त निरंकुस मोंहन ;
निरखि बँधे लट पासि॥
अबहीं पंगु भई मन की गति;
बिनु उधम अनियास।
तबकी कहा कहौं जब प्रिय प्रति ;
चाहति भृकुटि बिलास॥
कच संजमन व्याज भुज दरसति;
मुसकनि वदन विकास।
हा हरिवंश अनीति रीति हित ;
कत डारति तन त्रास॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चतुरासी (53)
(राग मल्हारा) [बरसात का समय] देखो मेरी शक्ति प्रबल है। मोहन बहुत नशे में था; निरखि बंधे लत पासी.. अब पिंगू भई मन की गति; बिनु उधम अनियास. कब कहूँ प्रिय प्रति; चाहति भृकुटि बिलास.. कच स्नजमन व्यज भुज दरसति; मुस्कानी वदन विकास। हा हरिवंश, अनिति रीति हित; कट दरति तंत्र.. - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चतुर्सी (53)