आजु बन राजत जुगल किसोर
Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 2 of 43
(राग गंधार)
आजु बन राजत जुगल किसोर।
नंद नँदन वृषभानु नंदिनी उठे उनीदें भोर॥ [1]
डगमगात पग परत सिथिल गति परसत नख ससि छोर।
दसन बसन खंडित मषि मंडित गंड तिलक कछु थोर॥ [2]
दुरत न कच करजनि के रोकें अरुन नैन अलि चोर।
(जै श्री) हित हरिवंश सँभार न तन मन सुरत समुद्र झकोर॥[3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (33)
(राग गंधार) आजु बन रजत जुगल किशोर। नंद नंदन वृषभानु नंदिनी एक सुबह जागी.. [1] लड़खड़ाते कदम, धीमी गति, तीखा अंत। दसन बसन खंडित मशी दिमित गोंड तिलक कछू थोर.. [2] दुरत न कच करजानी के रोके अरुण नैन अली चोर। (जय श्री) हित हरिवंश सनाभर एन तन मन सुरत समुद्र झकोर..[3] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (33)