काहे कौं मान बढ़ावतु है
Hit Chaurasi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 27 of 43
(राग कान्हरौ)
खंजन मीन मृगज मद मेंटत,
कहा कहौं नैननिं की बातैं।
सुनी सुंदरी कहाँ लौं सिखईं,
मोहन बसीकरन की घातैं॥ [1]
बंक निसंक चपल अनियारे,
अरुन स्याम सित रचे कहाँ तैं।
डरत न हरत परायौ सर्वसु,
मृदु मधुमिव मादिक दृग पातैं॥ [2]
नैंकु प्रसन्न दृष्टि पूरन करि,
नहिं मोतन चितयौ प्रमदा तैं।
(जै श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनि,
भावै सो करहु प्रेम के नातैं॥ [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (73)
(राग कान्हरौ) खंजन मिन मृगज मद मानत, कहौ कहौ नन्निन की बातें। सुन सुंदरी, कहां सिखाऊं तुम्हें, मोहन बसिकरन का घटाव.. [1] बीएनके निशंक चपल अनियारे, अरुण स्याम बैठ राचे कहां तैं। डरत न हरत पर्यु सर्वसु, मृदु मधुमिव मदिक दृग पटैन। [2] अपनी आंखों में सुख की दृष्टि भर लो, न कि अपनी आंखों में शांति भर लो। (जय श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनी, भवै सो करहु प्रेम के नातिन.. [3] - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (73)